Tuesday, September 17, 2019

अमरनाथ-लेह यात्रा जुलाई 2018 भाग 1

लेह....बहुत दूर है जनाब यहां जाने में तीन,चार दिन या 5 साल भी लग सकते हैं।

2013 मे नितिन ने मुझसे कुल्लू का दशहरा देखने चलने को कहा। मुझे नहीं पता था कि कुल्लू कहां है....नितिन से पूछने पर उसने मनाली के पास बताया,मनाली का तो मुझे पता था कि आनंदपुर साहिब जाते हुए....पातालपुरी गुरुद्वारा के पास ही मनाली का बोर्ड लगा है। हम भटकते हुए कुल्लू तो पहुंच गये पर वहां का दशहरा पसंद नहीं आया तो मनाली चले गये। मनाली में पेट भर रुकने के बाद पता लगा आगे रोहतांग भी है जहां "जब वी मेट" मूवी का गाना फिल्माया गया था। अगले दिन परमिशन लेने गये तो पता लगा कि मेरी गाड़ी बाहर की है तो हमें कोकसर पोस्ट तक एंट्री कराने जाना होगा। रोहतांग तक ठीक ठाक रोड़ थी मगर उसके आगे कोकसर तक पूरा कीचड़ ही कीचड़....उधर ही पता चला कि ये रास्ता लेह जाता है।

कोकसर से दिखते बंजर से पहाड़ जिनका बाद में पता लगा कि वो स्पिती है....रोहतांग की बर्फ और खतरनाक रास्तों ने ऐसा दिवाना बनाया कि वहां से आने के बाद बहुत से यात्रा संस्मरणों के जरिये लेह तक पहुंचा।

मोदी जी की नोटबंदी और नितिन के कालेधन की बदौलत मैने दिसंबर 2016 में अपनी बाईक खरीदी....2017 में अमरनाथ यात्रा का कार्यक्रम खटाई मे पड़ गया। नितिन बाबू अमरनाथ दर्शन करते हुए लेह जाना चाहते थे। इस साल "अम्बाला वाले नरेश सहगल साहब" के जरिये यात्रा का रजिस्ट्रेशन हुआ....अब हमारे पास बाईक और अमरनाथ यात्रा की परमिशन दोनों थे।

अब हमें लेह जाने से कोई नहीं रोक सकता....प्लानिंंग शुरु हुई,बहुत से प्लान बने,कुछ साथी जुड़े....कुछ रह गये। आखिर में मैं,नितिन,डॉ. अजय,नीलम जी,मुकेश पांडेय जी और सचिन जांगड़ा का जाना फाइनल हुआ। अजय भाई ने मुझे योजना आयोग का अध्यक्ष बनाया....मैने इतनी सारी योजनाऐं बनाई कि उन्होनें बस "हां ठीक है" कहा।

लेह जाने के जाने के सभी रास्तों को गूगल पर खोजा....

समझदार इंसान - जम्मू - उधमपुर - श्रीनगर होकर लेह जाते हैं।

खतरनाक इंसान - मनाली होकर लेह जाते हैं...

"हम चंबा,साच पास,किलाड़,किश्तवाड़,अमरनाथ होकर लेह जायेंगे"

लेह जाने की तैयारियों के नाम पर बस बाईक की सर्विस करवाई और कैरियर लगवाया....एक साल तक पहने जा सकने वाले कपड़े दो बैगों मे भरकर हम 4 जुलाई को सुबह 5 बजे घर से निकले।

बाईक की कमान नितिन के हाथ में थी जो उसने मेरे गलव्स पहनने के दौरान ही हथिया ली थी। नितिन बाईक को लहराता हुआ कभी दायें कभी बायें भगा देता...उधर दिल्ली के रास्तों से अन्जान पांडेय जी और अजय भाई की समझ मे ही नहीं आ रहा था कि एक लेन मे चलें या नितिन के पीछे....मैने दो,चार गाली देकर नितिन को समझाया तो करनाल बाईपास से सीधा चलने लगा।

सोनीपत वाले कौशिक जी की खीर...अंबाला वाले सहगल साहब की पूरियां खाते हुए हम भागे चले जा रहे थे। नितिन ने बाईक का हैंडिल पकड़ा हुआ था और मैने उसकी कमर को....जिसे मैं अपनी तसल्ली के लिए ओवरटेक करने और ब्रेक लगाने के लिए इस्तेमाल कर रहा था।

पांडेय जी पिछले 36 घंटों से जगे हुए थे उन पर थकान और नींद का असर देख मैने उन्हें मुकेरिंया (पंजाब) से पठानकोट तक बस में बिठा दिया.....मैं और नितिन पठानकोट शहर मे पहुंचे पांडेय जी को लेने पहुंचे और अजय भाई,जांगड़ा बाईपास से चंबा वाले रास्ते पर निकल गये। शाम हो चली थी....आज चंबा पहुंचने का जो टारगेट बनाया था वो अब असंभव सा लग रहा था।

आज की रात हम बनीखेत मे रुके। जहां पहुंच कर नितिन मेरे उपर गरम होने लगा कि कैसे बाईक चलाता है,ट्रक के नीचे आ जाता तो....मैने मिमियाते हुए समझाया कि बाईक आगे से उठ रही थी क्योंकि पीछे वजन ज्यादा था (पांडेय जी और दो बैग) और मैं हल्का सा इंसान.....

मिलते हैं अगले भाग में...विक्रम और बेताल के साथ

क्रमश....